पारंपरिक गोंड कला में आधुनिक तकनीक का समावेश एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति

Authors
  • पल्लवी वर्मा

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Abstract

मध्य प्रदेश की गोंड जनजातीय भारत की सबसे प्राचीन और समृद्ध जनजातियों में से मानी जाती है ,जिसकी कला परंपरा सददयों से चली आ रहीं है। गोंड कला का इतिहास उनके मिथकों, लोककथाओं, प्रकृति के प्रति विश्वास और दैनिक जीवन से जुडा हुआ है। पहले यह कला घरों की दीवारों ,मिट्टी के फर्श और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती थी। इसमें पेड-पौधों, जानकर एवं देवी-देवताओं व जनजातीय जीवन की झलक मिलती हैं। समय के साथ-साथ यह कला सजावटी नहीं रही, बल्कि गोंड समाज की सांस्कृतिक पहचान और जीवन दर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बन गईं।आज के वर्तमान समय में इस पारम्परिक कला पर आधुनिक तकनीक का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता हैं। कलाकार अब प्राकृतिक रंगों के साथ एक्रेलिक, इंक, पेन, कैनवस और मिश्रित माध्यम का प्रयोग कर रहे हैं। साथ ही डिजिटल प्लेटफाम एवं कला प्रदर्शनियों ने गोंड कला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी हैं। साथ ही तकनीकी माध्यमों ने कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता को भी बढाया है। वे जब अब रंगों, आकृतियों और संरचनाओं के साथ प्रयोग कर रहे हैं—कभी डिजिटल टेक्सचर जोड रहे हैं, तो कभी प्राकृतिक आकृतियों को आधुनिक रूपाकार में ढाल रहे हैं। इससे कला में नवाचार बढा है और दशकों के लिए यह अधिक आकर्षक बन गई है। इसी आधार पर प्रस्तुत शोध का उद्देश्य यह समझना है, कि तकनीक के आगमन ने गोंड कला की शैली, विषय-वस्तु और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को किस प्रकार प्रभावित किया है। यह अध्ययन परंपरा और तकनीक के समन्वय से विकसित हो रहे नए कलात्मक स्वरूप की पहचान और विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

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2025-11-30
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पारंपरिक गोंड कला में आधुनिक तकनीक का समावेश एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति. (2025). KALAA SAMIKSHA, 1(08), 299-304. https://kalaasamiksha.in/index.php/ks/article/view/62