लोक एवं जनजातीय कलाओं में पर्यावरणीय दृष्टि: एक सांस्कृतिक एवं सौंदर्यात्मक अध्ययन
- Authors
-
-
श्रेया द्विवेदी
Author
-
- Abstract
-
भारतीय लोक एवं जनजातीय कला उस सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जो मनुष्य और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों को अत्यंत सहज, संवेदनशील और प्रतीकात्मक रूप में अभिव्यक्त करती है। इन कला-रूपों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें प्रकृति केवल दृश्य-पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक जीवंत, सक्रिय और आदर योग्य सत्ता के रूप में प्रस्तुत होती है। चाहे गोंड कला के पेड़ हों, वारली के कृषि-चक्र, मधुबनी की नदियाँ और कमल हों, या भील चित्रकला में पशु-पक्षियों के तरल रूप हर जगह प्रकृति समुदाय के जीवन का मूल आधार बनकर उभरती है। इन कलाओं में निहित पर्यावरणीय संवेदना हमें यह समझने में सहायता करती है कि स्थानीय समाज प्रकृति को किस प्रकार ही नहीं, बल्कि क्यों भी महत्वपूर्ण मानता है।
इस शोध-पत्र में विभिन्न लोक एवं जनजातीय कला-परंपराओं की संरचना, उनके प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, प्रतीक-विधान, रंग-भाषा तथा सामुदायिक अनुभवों का अध्ययन किया गया है। विशेष रूप से यह स्पष्ट किया गया है कि ये कला-रूप आधुनिक पर्यावरणीय चिंताओं जैसे- सतत विकास, जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग के लिए कैसे प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। इन समुदायों द्वारा प्राकृतिक रंगों, जैविक सामग्रियों एवं सतत तकनीकों का प्रयोग यह दर्शाता है कि सौंदर्यशास्त्र और पर्यावरण-संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
समकालीन समय में बाज़ारीकरण, आधुनिकता और तकनीकी हस्तक्षेप ने इन कला-परंपराओं को नई चुनौतियों और अवसरों, दोनों से परिचित कराया है। फिर भी इन कलाओं में निहित पर्यावरणीय दृष्टि आज भी अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह मनुष्य को प्रकृति के प्रति संवेदनशील, जिम्मेदार और संतुलित जीवन दृष्टि अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
- References
- Downloads
- Published
- 2025-11-30
- Section
- Articles
- License
-
Copyright (c) 2025 श्रेया द्विवेदी (Author)

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.
