भारतीय परम्परा से आवृत्त लोक एवं जनजातीय कलाएं और साहित्य
- Authors
-
-
कविता यादव
Author
-
- Abstract
-
भारतीय लोककला एवं जनजातीय कलाएं एवं साहित्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है, और यह देश की अमूल्य संस्कृति को दर्शाता है। ये कलाएं और साहित्य भारतीय समाज के विविध पहलुओं को अभिव्यक्त करती है। और विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियो की झलक प्रस्तुत करती है। यह विरासत गांवो और जनजातियो मे सृजनात्मकता, समृध्दि, और सामाजिक एकता का प्रतीक है। भारतीय लोक एवं जनजातीय कला विभिन्न क्षेत्रो मे विविधता और अव्दितीयता का प्रतीक है, जो देश के विविध भौगोलिक और सांस्कृतिक परिदृश्यों से प्रेरित है। इस विरासत में लोक संगीत, लोक कथाये, लोक नृत्य, लोक कलायें, और लोक वाणी जनजातीय कलायें शामिल है। ये विभिन्न क्षेत्रो मे विकसित होते है, और वहां की जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन रूपो मे कला के माध्यम से स्थानीय, इतिहास, परंपरायें और सांस्कृतिक अंदरूनिता को प्रस्तुत किया गया है। भारतीय लोककला सांस्कृतिक विरासत का स्वरूप उसकी अनन्त विविधता समृध्दि और रचनात्मकता को दर्शाता है, और इसे एक सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन्त विरासत के रूप में माना जाता है। लोककला एवं जनजातीय कला भारतीय समाज के जीवन और संस्कृति के अभिन्न हिस्से का प्रतिबिम्ब करती है, और लोगो की भावनाओ, सामाजिक सम्बन्धों और रूढिवादो को प्रकट करती है। भारतीय लोककला एवं जनजातीय कला मे विभिन्न प्रान्तीय अलंकरण, परिधान,गीत नृत्य, नृत्य वाद्य, नृत्य अभिनय, कथा, लोक कथायें लोककला अन्य रंगमंच की कला को शामिल करके भारत की सांस्कृति को संजोये रखती है। यह अपने प्राचीन व सामाजिक मूल्यों को उत्कृष्टता के साथ प्रस्तुत करती है, इसके माध्यम से समाज के लोग अपनी भाषा, साहित्य, संगीत और नृत्य की अव्दितीयता को समझते है, और अपनी लोक परंपराओ को आगे बढाने में सक्षम होते है। इस प्रकार भारतीय लोककला समृध्दि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक अभिवृद्धि का आदान-प्रदान करती है।
- References
- Published
- 2025-11-30
- Section
- Articles
- License
-
Copyright (c) 2025 कविता यादव (Author)

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.
