डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आदिवासी कला का प्रसार सोशल मीडिया और वेबसाइटों के माध्यम से जनजातीय कला की वैश्विक पहुँच
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रविकान्त पांडे
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वर्तमान समय में सूचना तथा संप्रेषण तकनीक ने जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। इसका प्रभाव केवल आर्थिक या सामाजिक परिवर्तन तक सीमित नहीं है बल्कि यह सांस्कृतिक विरासतए पारंपरिक ज्ञान और लोक कलाओं के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत की आदिवासी कलाए जो वर्षों से जनजातीय समाज की धार्मिक आस्थाओं, प्राकृतिक संबंधों, पारिवारिक परंपराओं और सामुदायिक अनुभवों का प्रतीक रही है। अब डिजिटल माध्यमों के कारण वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से पहचानी जा रही है। यह शोध इस बात का विश्लेषण करता है कि किस प्रकार सामाजिक मंचों, इंटरनेट आधारित बाज़ारों और ऑनलाइन सांस्कृतिक पोर्टलों के द्वारा आदिवासी कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान और व्यापक पहुँच प्राप्त हो रही है।
डिजिटल माध्यमों ने आदिवासी कलाकारों को भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर अपनी कला को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया है। सामाजिक मंचों पर साझा की जाने वाली कलाकृतियों की तस्वीरें, लघु चलचित्र, कला.निर्माण की झलकियाँ, तथा कलाकारों के व्यक्तिगत अनुभव दर्शकों के साथ एक भावनात्मक संबंध स्थापित करते हैं। यह प्रक्रिया न केवल कला की बिक्री को बढ़ाती है बल्कि दर्शकों में उस कला और समुदाय के प्रति सम्मान और जिज्ञासा भी उत्पन्न करती है। इससे कलाकारों को बिचौलियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो जाती हैए जिससे उनकी आय में पारदर्शिता तथा स्वतंत्रता आती है।
कोविड महामारी के बाद ग्रामीण और जनजातीय कलाकारों ने डिजिटल माध्यमों का अधिक प्रयोग शुरू किया। अनेक आदिवासी चित्रकार, बुनकर, मिट्टी शिल्पकारए, बाँस शिल्पकार और लोक चित्रकारों ने अपने कार्यों को सामाजिक मंचों पर डाला जिससे उन्हें देश.विदेश से खरीदार मिलने लगे। कई समाचार पोर्टलों और सांस्कृतिक वेबसाइटों ने इस परिवर्तन पर विस्तृत रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं जिनमें यह स्पष्ट हुआ कि डिजिटल पहुँच ने कलाकारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है। उदाहरण के रूप मेंए गोंड, वारली, तथा मीणा, समुदायों की कला को देश के बाहर भी पहचान मिली और कई कलाकृतियाँ विदेशों तक पहुँचीं।
डिजिटल प्रचार की अनेक रणनीतियों जैसे चित्रों को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना नियमित रूप से सामग्री साझा करना, कला से जुड़ी कहानी बताना तथा दर्शकों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना ने कला के प्रसार को सरल और प्रभावी बनाया है। इसके साथ ही सरकार द्वारा संचालित कई योजनाएँ और जनजातीय विकास संस्थाएँ भी कलाकारों को ऑनलाइन प्रशिक्षण, डिजिटल भुगतान प्रणाली तथा इंटरनेट आधारित बाज़ार से जोड़ने में सहायक सिद्ध हो रही हैं।
सार रूप में यह शोध स्पष्ट करता है कि डिजिटल माध्यम केवल कला बेचने का साधन नहीं है बल्कि यह सांस्कृतिक संरक्षण, आर्थिक सशक्तिकरण, सामाजिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान की निरंतरता को भी मजबूती प्रदान करता है। डिजिटल तकनीक के माध्यम से आदिवासी कला आज विश्व के कोने.कोने तक पहुँच रही है और अपनी विशिष्ट शैली प्रतीकात्मकता तथा सांस्कृतिक गहराई के कारण व्यापक सम्मान अर्जित कर रही है। इस प्रकारए डिजिटल संसार जनजातीय कला के लिए एक नया युग प्रस्तुत कर रहा हैए जहाँ परंपरा और आधुनिकता मिलकर संस्कृति के संरक्षण और प्रसार का सशक्त सेतु निर्मित कर रहे हैं।
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- 2025-11-30
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