भारतीय कला के वैश्वीकरण में मृण्मूर्ति कला का योगदान
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पूनम देवी
Author
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- Abstract
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यह शोध पत्र भारतीय कला के वैश्वीकरण में मृण्मूर्ति कला के योगदान का अध्ययन करता है। मृण्मूर्ति कला, जो कि हड़प्पा सभ्यता से चली आ रही एक प्राचीन परंपरा है, न केवल भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को प्रदर्शित करती है, बल्कि वैश्वीकरण के इस दौर में यह भारत की कला-संस्कृति के संदेशवाहक के रूप में विश्वव्यापी स्तर पर अपनी पहचान बना रही है। यह कला आर्थिक एवं व्यावसायिक रूप से ग्रामीण कलाकारों को सशक्त कर रही है, और लंदन, न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक प्रदर्शनियों और संग्रहालयों में प्रदर्शित होकर अंतर्राष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर रही है।
इसके अतिरिक्त, यह शोध मृण्मूर्ति कला के माध्यम से प्रकृति संरक्षण में योगदान का भी अध्ययन करता है। यह कलाकृतियाँ मिट्टी, जल और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके बनाई जाती हैं, जो पर्यावरण को हानि नहीं पहुंचाती हैं और प्लास्टर ऑफ पेरिस के विपरीत जल स्रोतों को दूषित नहीं करती हैं, क्योंकि ये अविघटनीय नहीं होती हैं। यह टिकाऊ और प्रकृति के अनुकूल कला है।
शोध पत्र में के०जी० सुब्रह्मण्यम, हिम्मत शाह, और सतीश गुजराल जैसे आधुनिक कलाकारों के साथ-साथ रामकुमारी, विनोद बिहारी महतो, और चंद्रशेखर सिंह जैसे समकालीन कलाकारों के योगदान पर भी प्रकाश डाला गया है। वैश्वीकरण में आने वाली समस्याओं जैसे नवीन तकनीकी की कमी और सांस्कृतिक अनुवाद में कठिनाई के समाधान भी सुझाए गए हैं। अंत में, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि मृण्मूर्ति कला भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक बहुमूल्य भाग है जो उचित संरक्षण और प्रोत्साहन से भारत के सांस्कृतिक वैश्वीकरण की धुरी बन सकती है।
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- Published
- 2025-10-31
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Copyright (c) 2025 पूनम देवी (Author)

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