दैनिक जीवन में जनजातीय कला

Authors
  • दिलीप डामोर

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Abstract

जनजातीय कला, भारतीय समाज की एक अमूल्य धरोहर है जो हमारे देश के विभिन्न आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है। यह कला विभिन्न आदिवासी समुदायों के जीवन, उनके विश्वास, रीति-रिवाज और परंपराओं को व्यक्त करती है। जनजातीय कला भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन काल से ही विकसित हुई है, और इसे अपने रचनात्मक, विविध और विशिष्ट रूपों के लिए पहचाना जाता है। जनजातीय कला न केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक रूप है, बल्कि यह आदिवासी लोगों की सामाजिक संरचना, प्रकृति के प्रति उनका दृष्टिकोण और उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण पहलुओं का भी प्रतिनिधित्व करती है।

आज के आधुनिक और तकनीकी समाज में जहां हम लोग उच्चतम तकनीक का उपयोग करके कला का निर्माण करते हैं, वहीं जनजातीय कला का हर रूप अपने आप में एक प्राकृतिक रूप से विकसित विधा है जो बहुत गहरी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। जनजातीय कला का प्रयोग न केवल आदिवासी क्षेत्रों में बल्कि आधुनिक शहरों और शहरी जीवन में भी हो रहा है। यह कला अब भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी पहचानी जाती है और कई अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर इसे सम्मान प्राप्त हो रहा है।

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Published
2025-07-31
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Articles
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Copyright (c) 2025 दिलीप डामोर (Author)

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How to Cite

दैनिक जीवन में जनजातीय कला. (2025). KALAA SAMIKSHA, 1(04), 6-8. https://kalaasamiksha.in/index.php/ks/article/view/19